Saturday, September 5, 2020



मोह ने मोह को पंछियों के शोर को, अनसुना कर  गया ये जमाना,

अपने मतलब के आगोश में, आगे बढ़ता चला गया ये जमाना,

घर तो बहुत बने पत्थरों आशियाने के लिए ,

छतो पर दाना-पानी रखना भूल गया ये जमाना l l 

अमित कुमार सिंह 

Wednesday, August 19, 2020

Jhalak

 

Vo dikhta to roj h khabo m pr,
Chand dekhe jmana ho gya h,,,
Aaj darvajo se pucha to usne btaya,
Use khidhki khole bhi ek jamana ho gya h...


Vo pallo ki charmraht jo tuhe bhayabhit karti thi.
Unki shikayat lgaye huye bhi ek jamana ho gya h
jo dedar huaa tumhara to malum huaa,
Hume mile hue bhi jamana ho gya h...

                                                            अमित कुमार सिंह


Thursday, June 25, 2020

नसीबी

खुश नसीबी तो तेरी है, 
मन का हुआ तो हंस दिया नहीं तो रो दिया, 
कितना शक्त है मेरे आंसू का पिंजरा,
बेबसी तो मेरी देख,
मै चाह कर भी रो नहीं सकता।।
अमित कुमार सिंह

Sunday, May 31, 2020

नफ़रत

किन बातों से अब भी तुम परेशान हो, 
क्या बेबसी है क्यूँ हैरान हो, 
इतनी नफ़रत तुम्हें मुझसे क्यूँ है,
भूल जाओ सब कुछ, अब तुम आज़ाद हो ll 

जो चाहती थी बहाना , तुम उसमे कामयाब हो,
कैसे करू मैं नफ़रत ,बेवजह बेवक्त की बेबसी हो,
कुछ उठाई थी जिम्मेदारियाँ मुस्कुराहट के कारोबार की ,
भूल जाओ सब कुछ उन जिम्मेदारियाँ सेअब तुम आज़ाद हो ll   
अमित कुमार सिंह 

Thursday, May 7, 2020

उन्हें मालूम नहीं हैं यार

उन्हें मालूम नहीं हैं यार 
मेरे घर की छत बस छत नहीं हैं यार 
वो दिख रही जो खिड़की हैं 
वो बस खिड़की नहीं है यार 

हवा मंद हैं जरा चलने तो दो,
आहिस्ते पर्दे को हिलने तो दो ,
कान बेसब्र हैं उन घुंघुरुओं की आहट के लिए,
उसे एक बार पायल पहनने तो दो,

मड़राते भौरों की आदत रोज सी है.
नई कलियों को मुझतक आने तो दो,
तरस गयी है आँखे बस एक पल के लिए,
उसे एक बार छत पे आने तो दो,

जिन्हे लगता है की वो बस मामूली सी फर्श है 
मेरी छत, बहके हुए बचपने की मोहब्बत है यार,
उन्हें मालूम नहीं हैं 
मेरे घर की छत बस छत नहीं हैं यार 
अमित कुमार सिंह  

Wednesday, April 15, 2020

धरम पत्नि

किसी माईने मे मैं तुम्हारा हूँ  सब जानते है 
तुम्हारे जिद के आगे सब पिछड़ जाते है
तुम्हारी  खट्टी मीठी बातों ऐसे फिसले 
अब तो दिन मे भी तारे नज़र आते हैं 
  अमित कुमार सिंह 

Monday, April 13, 2020

तुम्हारे लिए ,


डगमगाती  लौह ने कुछ कहा है तुम्हारे लिए ,
बहकती हवाओ ने सुनाया है तुम्हारे लिए ,
कोरे कागज पर कयास तो सब लगाते 
लडख़ड़ाते हाथो ने कुछ लिखा है तुम्हारे लिए ,

इस दिल को कहा कुछ पता है 
जान  हम जिन्दा है तुम्हारे लिए ,
खता तो बस इतनी ही है इस दिल की ,
ये धड़कता है बस तुम्हारे लिए ,
अमित कुमार सिंह