Sunday, May 31, 2020

नफ़रत

किन बातों से अब भी तुम परेशान हो, 
क्या बेबसी है क्यूँ हैरान हो, 
इतनी नफ़रत तुम्हें मुझसे क्यूँ है,
भूल जाओ सब कुछ, अब तुम आज़ाद हो ll 

जो चाहती थी बहाना , तुम उसमे कामयाब हो,
कैसे करू मैं नफ़रत ,बेवजह बेवक्त की बेबसी हो,
कुछ उठाई थी जिम्मेदारियाँ मुस्कुराहट के कारोबार की ,
भूल जाओ सब कुछ उन जिम्मेदारियाँ सेअब तुम आज़ाद हो ll   
अमित कुमार सिंह 

Thursday, May 7, 2020

उन्हें मालूम नहीं हैं यार

उन्हें मालूम नहीं हैं यार 
मेरे घर की छत बस छत नहीं हैं यार 
वो दिख रही जो खिड़की हैं 
वो बस खिड़की नहीं है यार 

हवा मंद हैं जरा चलने तो दो,
आहिस्ते पर्दे को हिलने तो दो ,
कान बेसब्र हैं उन घुंघुरुओं की आहट के लिए,
उसे एक बार पायल पहनने तो दो,

मड़राते भौरों की आदत रोज सी है.
नई कलियों को मुझतक आने तो दो,
तरस गयी है आँखे बस एक पल के लिए,
उसे एक बार छत पे आने तो दो,

जिन्हे लगता है की वो बस मामूली सी फर्श है 
मेरी छत, बहके हुए बचपने की मोहब्बत है यार,
उन्हें मालूम नहीं हैं 
मेरे घर की छत बस छत नहीं हैं यार 
अमित कुमार सिंह