उन्हें मालूम नहीं हैं यार
मेरे घर की छत बस छत नहीं हैं यार
वो दिख रही जो खिड़की हैं
वो बस खिड़की नहीं है यार
हवा मंद हैं जरा चलने तो दो,
आहिस्ते पर्दे को हिलने तो दो ,
कान बेसब्र हैं उन घुंघुरुओं की आहट के लिए,
उसे एक बार पायल पहनने तो दो,
मड़राते भौरों की आदत रोज सी है.
नई कलियों को मुझतक आने तो दो,
तरस गयी है आँखे बस एक पल के लिए,
उसे एक बार छत पे आने तो दो,
जिन्हे लगता है की वो बस मामूली सी फर्श है
मेरी छत, बहके हुए बचपने की मोहब्बत है यार,
उन्हें मालूम नहीं हैं
मेरे घर की छत बस छत नहीं हैं यार
अमित कुमार सिंह
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